• चीन को दलाई लामा की दो-टूक- मेरा उत्तराधिकारी भारत से आएगा

    कृष्ण एन. दास और सुनील कटारिया, द वायर

    धर्मशाला। तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक धर्मगुरु दलाई लामा ने सोमवार को कहा कि यह संभव है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका अवतार भारत में हो सकता है, जहां वह 60 साल से निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि चीन द्वारा नामित किसी अन्य उत्तराधिकारी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    तिब्बत की राजधानी ल्हासा से एक सैनिक के वेष में अपने  पलायन कर हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे निर्वासित तिब्बतियों द्वारा सालगिरह मनाए जाने के अगले दिन हरी पहाड़ियों और बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरे एक मंदिर के बगल के कार्यालय में बैठे 14वें दलाई लामा रायटर से बात कर रहे थे।

    वह 1959 की शुरुआत में चीनी शासन के खिलाफ तिब्बती जनक्रांति के बाद भारत पलायन कर गए थे और तब से उन्होंने अपने दूरस्थ और पहाड़ी मातृभूमि में भाषाई और सांस्कृतिक स्वायत्तता के लिए काम किया और इसके लिए उन्हें वैश्विक समर्थन भी मिला।

    1950 में तिब्बत पर नियंत्रण रखने वाले चीन ने 83 वर्षीय नोबेल शांति पुरस्कार विजेता को एक खतरनाक अलगाववादी घोषित कर रखा है।

    अपनी मृत्यु के बाद की परिस्थितियों का आकलन करते हुए दलाई लामा को आशंका है कि बीजिंग द्वारा तिब्बती बौद्धों में से ही उनका उत्तराधिकारी बना दिया जाएगा। इस आशंका के मद्देनजर वह कुछ प्रत्याशित प्रयास कर रहे हैं।

    पारंपरिक लाल वस्त्र, पीले दुपट्टा और स्वेटर पहने दलाई लमा ने कहा, ‘चीन दलाई लामा के पुनर्जन्म को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। वे मेरे मुकाबले अगले दलाई लामा से अधिक चिंतित हैं।’

    उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘भविष्य में आप दो दलाई लामाओं को देख सकते हैं। एक यहाँ मुक्त देश में और दूसरा चीनी द्वारा चुना हुआ तो चीन के लिए यह एक अतिरिक्त समस्या होगी। कोई भी भरोसा नहीं करेगा, कोई भी सम्मान नहीं करेगा (चीन द्वारा चुने गए का)। यह संभव है, यह हो सकता है।’

    चीन ने कहा है कि उसके नेताओं को दलाई लामा के उत्तराधिकारी को मंजूरी देने का अधिकार है, क्योंकि यह चीन के सम्राटों से उसे विरासत में मिला है।

    लेकिन तिब्बती लोग- जिनकी परंपरा यह मानती है कि उनकी मृत्यु पर एक बच्चे के शरीर में एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु की आत्मा का पुनर्जन्म होता है – किसी भी चीनी भूमिका को समुदाय पर प्रभाव डालने के लिए एक चाल के रूप में संदेह की दृष्टि से देखते हैं।

    1935 में जन्मे वर्तमान दलाई लामा की पहचान उनके पूर्ववर्ती के पुनर्जन्म के रूप में हुई, जब वह दो साल के थे।

    चीन द्वारा दलाई लामा या उनकी तस्वीर या भक्ति के किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शन पर सरकारी प्रतिबंधों के बावजूद साठ लाख तिब्बतियों में से अधिकतर अभी भी दलाई लामा की वंदना करते हैं।

    बातचीत के लि‍ए तैयार

    दलाई लामा ने कहा कि अपनी मातृभूमि तिब्ब्त में रहनेवाले और निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के बीच संपर्क बढ़ रहा था,  लेकिन 2010 के बाद से चीनी और उनके प्रतिनिधियों के बीच कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई है।

    हालांकि,  अनौपचारिक रूप से  बीजिंग से संपर्क वाले कुछ सेवानिवृत्त चीनी अधिकारी और व्यवसायी समय-समय पर उनसे मिलते रहते हैं।

    उन्होंने कहा कि उनकी मृत्यु के बाद दलाई लामा की भूमिका के बारे में इस वर्ष के अंत में भारत में तिब्बती बौद्धों की एक बैठक के दौरान चर्चा की जा सकती है।  इसमें यह मुद्दा भी शामिल रहेगा कि इस पद को बनाए रखना है?

    हालांकि, उन्होंने कहा कि यद्यपि बुद्ध का पुनर्जन्म नहीं हुआ था, लेकिन उनकी शिक्षाएं बनी हुई हैं।

    उन्होंने कहा  ‘अगर अधि‍कांश (तिब्बती लोग) वास्तव में इस संस्था को बनाए रखना चाहते हैं  तो यह संस्था बनी रहेगी। तब फिर 15वें दलाई लामा के पुनर्जन्म का सवाल आता है।‘

    दलाई लामा ने कहा, यदि कोई दलाई लामा बनते हैं  तो उनके पास ‘कोई राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं होगी’। वर्तमान दलाई लामा ने 2001 में अपने राजनीतिक जि‍म्मेदारियों से खुद को अलग कर लिया था और भारत में रह रहे 1, 00,000  तिब्बतियों के लिए एक लोकतांत्रिक प्रणाली विकसित की।

    चीन में सेमिनार?

    साक्षात्कार के दौरान, दलाई लामा ने कॉस्मोलॉजी,  न्यूरोबायोलॉजी,  क्वांटम फीजिक्स और मनोविज्ञान के प्रति अपने लगाव के बारे में मनोभावपूर्वक बात की।

    उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कभी अपनी मातृभूमि की यात्रा करने की अनुमति दी गई  तो वह इन विषयों के बारे में चीनी विश्वविद्यालय में बोलना पसंद करेंगे।

    लेकिन वह वहां तब तक जाने की उम्मीद नहीं कर रहे हैं जब तक कि चीन कम्युनिस्ट शासन के अधीन है।

    उन्होंने कहा, ‘चीन – महान राष्ट्र है, प्राचीन राष्ट्र है- लेकिन इसकी राजनीतिक प्रणाली अधिनायकवादी है। वहां कोई स्वतंत्रता नहीं है। इसलिए मैं यहां इस देश में रहना पसंद करता हूं।’

    दलाई लामा का जन्म तिब्बत पठार के उत्तर-पूर्वी किनोर बसे किंघई प्रांत के एक गाँव ताकसेर में एक किसान परिवार में हुआ था।

    हाल ही में ताकसेर की यात्रा के दौरान रायटर के रिपोर्टर ने पाया कि स्वचालित हथियारों से लैस पुलिस और एक दर्जन से अधिक सादे कपड़े पहने अधिकारियों ने गांव जाने की सड़क को अवरुद्ध कर रखा है। उन्होंने बताया कि गांव में बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है।

    दलाई लामा ने कहा  ‘हमारी मजबूती, हमारी शक्ति सच्चाई पर आधारित है। चीनी शक्ति बंदूक के बल पर है।‘ थो़ड़े समय के लिए तो  बंदूक बहुत अधिक निर्णायक है लेकिन दीर्घकाल के लिए तो सत्य ही अधिक शक्तिशाली है।‘

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