• तिब्बती राष्ट्रीय विद्रोह दिवस की 60वीं वर्षगांठ पर सिक्योंग का बयान

    तिब्बती राष्ट्रीय विद्रोह दिवस की 60वीं वर्षगांठ पर सिक्योंग का बयान
    जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पहली बार तिब्बत में आई, उस समय उसने तिब्बत के लिए एक सड़क बनाने का व़ादा किया। कहा भी कि ‘वन रोड’ तिब्बत और तिब्बती लोगों के लिए ‘शांति और समृद्धि’ लाएगा। हालांकि, एक बार जब ‘वन रोड’ का निर्माण हो गया, चीनी पीएलए के ट्रक, टैंक, बंदूक के साथ बड़ी संख्या में सैनिक आए और पूरे तिब्बत पठार पर कब्जा कर लिया।
    साठ साल पहले आज के ही दिन 1959 में तिब्बत में तिब्बती लोग चीन सरकार के तिब्बत पर अवैध कब्जे के खिलाफ उठ खड़े हुए। हवा में मुट्ठी लहराकर हमारे बहादुर भाइयों और बहनों ने चीन सरकार को जोर से चिल्ला़कर स्पष्ट कर दिया कि तिब्बत तिब्बती लोगों की भूमि है! तिब्बत तिब्बतियों का है! वे बड़ी तेजी से एकजुट होने लगे, उन्होंने एकजुट होकर अपने सबसे प्रतिष्ठित नेता, हमारे त्वाई लामा, हमारे मूल गुरु, परम पावन 14वें दलाई लामा की रक्षा की।
    छह दशकों के लंबे समय में तिब्बतियों का चीन सरकार द्वारा क्रूरतापूर्वक दमन किया गया है। ऊन्होंने हमारे मौलिक अधिकारों से रहित कर दिया और वे यहां से तिब्बती भाषा, संस्कृति, हमारी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक क्रियाकलापों को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट करने पर तुले हुए हैं। चीन लगातार इस धरती से तिब्बती सभ्यता को मिटाने के व्यवस्थित प्रयास में लगा है।
    ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी इस साल की वार्षिक रिपोर्ट में बताया कि चीनी अधिकारियों ने ‘राष्ट्रव्यापी अपराध-विरोधी अभियान’ का उपयोग कर लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया है  कि परम पावन दलाई लामा के प्रति सहानुभूति के थोड़े से संदेह पर भी वे अपने समुदाय के लोगों को हतोत्सा्हित करें।
    इससे भी ज्यादा, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दमन हाल के वर्षों में काफी बढ़ गया है। भाषा कार्यकर्ता ताशी वांगचुक इस समय चीनी जेल में 5 साल की सजा काट रहे हैं। उनका एकमात्र अपराध तिब्बती बच्चों के सांस्कृतिक और भाषाई अधिकारों की चीनी संविधान में उल्लेखित प्रावधानों के तहत ही वकालत करना था। तिब्बती बच्चों पर उनके स्थानीय मठों में आयोजित अनौपचारिक तिब्बती कक्षाओं में भाग लेने पर भी प्रतिबंध है।
     वैश्विक निगरानी नेटवर्क को नियंत्रित करने की अपनी महत्वाकांक्षा के तहत  चीन ने तिब्बत को सर्वव्यापी निगरानी के लिए एक परीक्षण मैदान में बदल दिया गया है। जिसे ‘सामाजिक प्रबंधन की ग्रिड प्रणाली’ कहा जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी ने जमीनी स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक निगरानी के साथ तिब्बत पर अपने सत्तावादी नियंत्रण को मजबूत किया है। इसके अतिरिक्त  2008 से ही शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ तिब्बत के दूरदराज इलाकों तक  में हर प्रमुख सड़क पर रोडब्लॉक और चौकियों की स्थापना कर दी गई है। कथित  तिब्बतन ऑटोनॉमस रिजन (टीएआर) में औसतन प्रत्येक 20 तिब्बतियों पर कम से कम एक सरकारी कैडर को तैनात किया  गया है। यहां के मनहूस संसार में बेटे को बाप के खिलाफ,  बेटी को मां के खिलाफ, एक भाई को बहन के खिलाफ बहन को भाई के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है।
    आम तौर पर धरती के ‘तीसरे ध्रुव’ के नाम से जाना जाने वाले तिब्बत में दोनों ध्रुवों के अलावा दुनिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर का भंडार है। इसलिए तिब्बती पठार एशिया की बड़ी नदियों का उद्गम स्थल भी है जिसके जल पर लगभग एक अरब आबादी निर्भर करती है। परिणामस्वरूप यहां की उंचाइयों पर बढ़ता तापमान एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन पर खतरनाक असर डाल रहा है और  दुनिया भर में नकारात्मक जलवायु परिवर्तन को तेजी से बढ़ा भी रहा है। चीन की त्रुटिपूर्ण पर्यावरण नीतियों ने संसाधन संपन्न तिब्बती पठार को खनन और बांध निर्माण गतिविधियों के केंद्र में बदल दिया है, जो और खतरनाक स्थिति का जनक हो गया है।
    तिब्बत और उसके लोगों पर हमले हमेशा से बहुपक्षीय रहे हैं। बीस लाख से अधिक तिब्बती और तिब्बती खानाबदोशों को उनकी जमीन से जबरन हटा दिया गया है और गरिमापूर्ण जीवन जीने की मौलिक सुविधाओं- चिकित्सा, शैक्षिक या व्यावसायिक अवसरों के बगैर ही उन्हें बड़े पैमाने पर बनाई गई बस्तियों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
    इन कठोर और दमनकारी नीतियों के प्रति आक्रोश के रूप में 2009 से अब तक तिब्बत में 153 तिब्बतियों ने आत्मदाह कर लिया है। नवीनतम आत्मदाह 4 नवंबर, 2018 को डोपो नामक 23 वर्षीय एक युवक द्वारा किया गया था। डोपो ने यह कदम तिब्बतियों के लिए आजादी और परम पावन दलाई लामा के तिब्बत लौटने की मांग करते हुए उठाई।
    फ्रीडम हाउस की 2019 की रिपोर्ट में तिब्बत को लगातार चार वर्षों तक सीरिया के बाद सबसे कम मुक्त क्षेत्र के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने तिब्बत में ‘प्रेस स्वतंत्रता के व्यवस्थित उल्लंघन पर नाराजगी’ व्यक्त करते हुए कहा है कि पत्रकारों के लिए उत्तर कोरिया की तुलना में तिब्बत तक पहुंच बनाना अधिक कठिन है।
    दुनिया भर में मेरे तिब्बती भाइयों और बहनों ने इतिहास में सबसे अंधेरे दौर में रहने के बावजूद एकता में एक साथ खड़े रहने का संकल्प व्यक्त किया है और सभी बाधाओं के खिलाफ कई शानदार चीजें हासिल की हैं। पिछले छह दशकों में हमारी यात्रा आशा, संकल्प और प्रतिरोध की भी रही है।
    1950 के दशक की शुरुआत से ही पूर्वी तिब्बत में चीन के दमन के हर कार्य का अब तक तिब्बतियों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से लेकिन दृढता के साथ प्रतिरोध किया गया है। 1959 के राष्ट्रीय विद्रोह से लेकर 1960 के दशक में जेलों और एकाग्रता शिविरों में प्रतिरोध आंदोलनों तक, 70 के दशक में विद्रोही गुटों के विद्रोह से लेकर 80 के दशक में ल्हासा उत्थान और 90 के दशक के प्रदर्शनों में वर्षों तक तिब्बतियों ने सामूहिक रूप से अपने अधिकारों, न्याय और स्वतंत्रता के लिए जोरदार लड़ाई लड़ी।
    2008 में तिब्बत पर चीनी अतिक्रमण के खिलाफ  राष्ट्रव्यापी विद्रोह के दौरान आधुनिक दुनिया तिब्बत में तिब्बतियों द्वारा अपनी गरिमा और आजादी के प्रति अटूट साहस का गवाह बनी। तिब्बत के अंदर के तिब्बतियों के पास समय है और वे फिर से एक स्पष्ट संदेश देना चाहते है: “हमारी आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता है, हमारी प्रतिबद्धताएं लड़खड़ाएंगी नहीं।”
    इसी तरह, निर्वासित तिब्बती समुदाय ने न केवल अपने को फिर से खड़ा कर लिया है बल्कि दुनिया में सबसे सफल शरणार्थी समुदाय में से एक बन गया है। जब हमारे दादा- दादी  60 साल पहले निर्वासित होकर भारत आए थे तो उनके सामने अनिश्चित भविष्य था और उनके सिर पर छत नहीं थी। लेकिन परम पावन दलाई लामा के कुशल नेतृत्व  में उन्हों ने तिनका- तिनका,  ईंट-ईंट जोड़कर घरों, स्कूलों, मठों और समुदायों का निर्माण किया। तिब्बती किसान अपने मकई के खेतों में आशा के बीज बोते हैं। पारंपरिक तिब्बती आसनों को बनाने वाली तिब्बती महिलाओं ने निर्वासित तिब्बतियों और उनके बच्चों के लिए भविष्य का ताना-बाना बुन दिया।
    इन संस्थानों और समुदायों के माध्यम से हमने निर्वासन में यहीं अपनी  भाषा, संस्कृति, अपनी पहचान और अपने पवित्र मठों को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने में कामयाबी हासिल की है। हमारे इतिहास, परंपरा, दर्शन और रचनात्मक दृष्टिकोण ने हमारी कहानी एक पीड़ित मानसिकता से ऊपर उठकर एक उत्तरजीवी और सफलता वाली मानसिकता में बदल दी है। दशकों तक चली हमारी परियोजनाओं को कुशलतापूर्वक और सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने की हमारी क्षमता ने हमारे दोस्तों, समर्थकों, धनदाताओं और सहायता समूहों से प्रशंसा प्राप्त की है।
    परम पावन दलाई लामा के मत के अनुरूप चलकर निर्वासित तिब्बतियों  का सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन एक मजबूत लोकतांत्रिक संस्था के रूप में विकसित हुआ है। इसे कानून का राज, लैंगिक समानता और वैश्चिक मतों के आधार पर विकसित किया गया है। 2011 में परम पावन ने राजनीतिक सत्ताआ तिब्बती लोगों द्वारा स्वतंत्र और लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेतृत्वं को समर्पित कर दी। आज सीटीए तिब्बतत के अंदर रह रहे तिब्बचतियों और  दुनिया भर के 40 विभिन्न देशों में फैले तिब्बती निर्वासितों का प्रतिनिधित्व करता है। सीटीए की पहली प्राथमिकता  71 तिब्बती बस्तियों, 276  मठों और भिक्षुणी विहारों, 68 स्कूलों की देखरेख करना है। तिब्बती समुदाय में साक्षरता दर अधिकतर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई  देशों  की तुलना में कहीं अधिक है। अस्पतालों, क्लीनिकों, स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों, और वृद्धाश्रमों की संख्या भी इन देशों  की तुलना में अधिक है। ये सब के सब भारत, नेपाल और भूटान में स्थित हैं। हमारे पास आधिकारिक एजेंसी के रूप में कार्य करने वाले तिब्बत कार्यालय 13 विभिन्न देशों में स्थापित हैं।
    हमारी सफलता केवल हमारे समुदाय में ही प्रतिबिंबित नहीं होती है। तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन ने 54 विभिन्न देशों में तिब्बत सहायता समूहों (टीएसजी) और 40 देशों में संसदीय सहायता समूहों के साथ दुर्गम अंतर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त किया है। आज जापान में 90 सदस्यीय तिब्बत समर्थक सर्वदलीय संसदीय समूह है जो दुनिया में सबसे बड़ा समूह है। यूरोपीय देशों के बीच देखें तो चेक संसदीय समूह अपनी तरह का सबसे बड़ा समूह है और जो इस पर गर्व करता है। यहां चेंबर ऑफ डेपुटीज और सीनेट- दोनों सदनों से कुल 50 सदस्य सर्वदलीय तिब्बत समर्थक समूह में हैं।
    2018 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में कुछ सबसे शक्तिशाली सदस्य देशों ने तिब्बत में व्यापक मानव अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए चीन से अपील की है। ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, जापान, न्यूजीलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका ने तिब्बत के लिए सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा के तीन दौर के दौरान तिब्बत के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।
    इसी तरह के एक अहम वाकये में दिसंबर 2018 में संयुक्त राज्य ने रेसिप्रोकल एक्सेस टू तिब्बत एक्ट पारित करके एक अभूतपूर्व कदम उठाया। यह दि्वपक्षीय कानून अमेरिकी अधिकारियों और पत्रकारों के तिब्बत में प्रवेश को प्रतिबंधित करने के लिए जिम्मेदार चीनी अधिकारियों  को अमेरिका में प्रवेश करने की अनुमति देने से इनकार करता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘एशिया रिअसुरेंस इनिशिएटिव’ अधिनियम के साथ तिब्बत के लिए समर्थन को मजबूत किया। यह कानून विशेष रूप से तिब्बती संस्कृति, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के संवर्धन और संरक्षण के लिए अमेरिकी आर्थिक मदद को सुरक्षित करता है।
     हम जानते हैं कि चीनी सरकार ‘सहयोग’ और ‘संवाद’ के प्रति केवल दिखावटी प्रेम प्रदर्शित  करती  है। अगर यह वास्तव में मानती है कि ‘सहयोग विश्व शांति ला सकता है’ तो इसे तिब्बत पर लागू करना शुरू कर देना चाहिए। चीनी सरकार को तिब्बत मुद्दे को हल करने के लिए परम पावन दलाई लामा के दूतों के साथ बातचीत करनी चाहिए। परम पावन द्वारा प्रतिपादित मध्यम मार्ग दृष्टिकोण चीन के संविधान के तहत तिब्बती लोगों के लिए एक वास्तविक स्वायत्तता की मांग करता है। परम पावन के दूत किसी भी समय और कहीं भी चीनी दूतों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं।
     तिब्बत में दमन के 60 वर्षों को समाप्त करने की तलाश के बजाय चीन सरकार एक ‘शून्य और 100 रणनीति’ के साथ सामने आई है। इस नई रणनीति के तहत, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और निर्वासित तिब्बतियों की सूचनाएं तिब्बत में आने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है और निर्वासित तिब्बतियों  और बाहरी दुनिया भर में तिब्बत  के बारे में 100% चीनी प्रचार किया जा रहा है।
    चीनी सरकार को लंबे समय से उम्मीद थी कि तिब्बत का मुद्दा अंततः समय के साथ मिट जाएगा। लेकिन पिछली आधी सदी का हमारा अनुभव कुछ अलग रहा है। तिब्बत में युवा तिब्बती दमन और प्रतिरोध का अनुभव करते हैं, जबकि निर्वासन में युवा तिब्बती स्वतंत्रता और लोकतंत्र के साथ रहते हैं। साथ में, तिब्बत और निर्वासन में युवा पीढ़ी सच्चाई और न्याय की मांग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। तिब्बतियों की यह नई पीढ़ी अपनी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करने और उनकी गरिमा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। वे तब तक संघर्ष के जत्थे को आगे बढ़ाने के लिए भी तैयार हैं जब तक कि तिब्बत का मसला हल नहीं हो जाता। अंतत: यह तिब्बती लोगों के लिए खुद की नियति और तिब्बत का फैसला करना है।
    60 वर्षों तक हमें मिले समर्थन के प्रति आभार जताने के लिए हमने वर्ष 2018 को ‘आभार वर्ष’ के रूप में समर्पित किया और तिब्बत के पुराने और नए दोस्तों के प्रति हमारी गहन प्रशंसा व्यक्त करने के लिए ‘थैंक यू इंडिया’ से यह कार्यक्रम शुरू करके ‘थैंक यू अमेरिका’ पर जाकर इसका समापन किया है। इस बीच हमने  विभिन्न देशों में ‘थैंक यू’ कार्यक्रमों का आयोजन किया और तिब्ब त के नए और पुराने दोस्तों के प्रति आभार जताया है। एक बार फिर हम भारत और दुनिया भर में अपने प्यारे दोस्तों प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना चाहते हैं। दोस्तों, हम याद दिलाना चाहते हैं कि तिब्बत का दु:खद मामला इस बात की एक कड़ी याद दिलाता है कि कितना काम होना बाकी है। साठ सालों के तिब्बत पर कब्जे और तिब्बतियों का दमन लंबा चलने वाला  है।
    तिब्बती संघर्ष आगे बढ़ता रहे, इसे सुनिश्चित करने के लिए काशाग ने आधिकारिक तौर पर वर्ष 2019 को ‘प्रतिबद्धताओं का वर्ष’ घोषित किया है। हम दुनिया के आजादी पसंद लोगों का आह्वान करते हैं कि वे तिब्बतियों के दमन के खिलाफ खड़े हों और हमारे संघर्ष के प्रति प्रतिबद्धता का इजहार करें। हर जगह उपस्थित तिब्बती लोगों से आह्वान है कि आइए हम न्याय के लिए संघर्ष के प्रति प्रतिबद्ध हों। आइए हम तिब्बत के अंदर स्वतंत्रता और न्याय को बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हों। आइए हम तिब्बत के महान 14वें परम पावन को दलाई लामा को पोटाला पैलेस में वापस ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हों, जहां रहने के वे सच्चे अधिकारी हैं।
    दलाई लामा- अमर रहें!
    तिब्बत- जिन्दाबबाद!

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