• तिब्बत में पार्यवरण एवं विकास का मुद्दा

    तिब्बत का पर्यावरण
    एशिया के हृदय स्थल में स्थित तिब्बत पर्यावरणीय दृष्टि से दुनिया के सबसे रणनीतिक और संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। पृथ्वी के सजीव और निर्जीव दोनों तरह के तत्वों के अन्योन्याश्रय के बौद्ध मान्यता से निर्देशित होने वाले तिब्बती प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते हैं। लेकिन तिब्बत पर चीनी आधिपत्य के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की उपभोक्तावादी और भौतिकवादी विचारधारा ने तिब्बती लोगों के प्रकृति अनुकूल रवैये को कुचल दिया।

    पिछले पचास वर्षों में तिब्बत में वनों की कटाई, मृदा अपक्षरण, वन्यजीवों की मौत, अत्यधिक चराई, अनियंत्रित खनन और नाभिकीय कचरे के जमाव के रूप में बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय विनाश हुआ है। आज भी चीनी शासन के लोग प्रायः

    विदेशी शह पर बिना किसी पर्यावरणीय सुरक्षा के विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी रखे हुए हैं। इसके परिणामस्वरूप तिब्बत एक पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है जिसका प्रभाव तिब्बत की सीमाओं से काफी दूर तक महसूस किया जा सकता है।

    वनों का उजड़ना
    दुनिया के उत्तम किस्म के संरक्षित वनों में से कई तिब्बत में हैं। सैकड़ों वर्षों में विकसित इन वनों में कई वृक्ष नब्बे फीट तक ऊँचे हैं और उनकी गोलाई ५ फीट या उससे भी अधिक है। तिब्बत के लिए चीन की विकास” और आधुनिकीकरण” की योजनाओं ने इन वनों का अविवेकपूर्ण विनाश किया है। १९५९ में तिब्बत में २.५२ करोड हेक्टेयर वन क्षेत्र था जो १९८५ में घटकर सिर्फ १.३६ करोड़ हेक्टेयर रह गया। तिब्बत के वनों का ४६ प्रतिशत सेअधिक हिस्सा नष्ट हो चुका है और कुछ क्षेत्रों में वनों का ८० प्रतिशत तक हिस्सा नष्ट हो चुका है।

    १९५९ से १९८५ के बीच चीनी लोग तिब्बत से ५४ अरब डॉलर कीमत की लकड़ी ले गये। वनों की कटाई और वनारोपण के अपर्याप्त कार्यक्रमों ने वन्यजीवन पर गंभीर प्रभाव डाला और इससे मृदा अपरदन और वैश्विक मौसम प्रवृत्ति में बदलाव को बढ़ावा मिला।

    मृदा अपरदन और बाढ़
    तिब्बत में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, खनन और गहन कृषि के तरीकों से मृदा अपरदन को बढ़ावा मिला है और एशिया की कई सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदियों में गाद का जमाव हुआ है। मेकांग, यांगसी, सिंधु, सालवीन और येलो नदियों में गाद के जमाव से इन नदियों का तल ऊपर हो गया है और इस कारण हाल के वर्षों में एशियाई क्षेत्रों में कई भीषण बाढ़ आए हैं। १९८७ – ८८ में भारत में आने वाली बाढ़ में से ३५ प्रतिशत या उससे अधिक का योगदान ब्रह्मपुत्र नदी का था। इसके कारण भूस्खलन को बढ़ावा मिला और खेती की संभावना वाले भूमि में कमी आयी जिससे तिब्बत के नीचे स्थित भू-भाग में रहने वाली दुनिया की आबादी के लगभग आधे लोग प्रभावित हुए।

    वैश्विक जलवायु प्रभाव
    वैज्ञानिकों ने तिब्बती पठार पर स्थित प्राकृतिक वनस्पतियों एवं मानसून की स्थिरता के बीच एक अंर्तसंबंध ढूंढा है जो दक्षिण एशिया के लिए अपरिहार्य है। वैज्ञानिकों ने यह भी खोजा है कि तिब्बती पठार का पर्यावरण उन जेट धाराओं को प्रभावित करता है जो प्रशांत क्षेत्र में टायफून और अलनीनो प्रभाव से संबंधित हैं। इसके कारण समूची दुनिया के पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
    वन्य जीवन का विनाश १९०१ में तेरहवें दलाई लामा ने तिब्बत में वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध का शासनादेश जारी किया। दुर्भाग्य से चीनी शासन ने इस प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया और इसके विपरीत     विलुप्तप्राय प्रजातियों के शिकार को बढ़ावा दिया गया। इस समय तिब्बत के पठार पर कम से कम ८१ विलुप्तप्राय प्रजातियां हैं जिसमें से ३९ स्तनधारी, ३७ पक्षी, चार उभयचर और एक सरीसृप वर्ग का प्राणी है। संभवतः इनमें से सबसे प्रसिद्ध विच्चालकाय पांडा है जो मूलरूप से तिब्बत में पाया जाता है और जिसे चीनियों ने अपने राष्ट्रीय शुभंकर के रूप में प्रचारित किया है।
    अनियंत्रित खनन
    चीन सरकार ने औद्योगिक वृद्धि के लिए कच्चे माल की जरूरतों की पूर्ति के लिए बोरैक्स, क्रोमियम, नमक, तांबा, सोना और यूरेनियम के निष्कर्षण को बडे+ पैमाने पर बढ़ावा दिया है। इस बात की आशंका है कि चीन के १५ प्रमुख खनिजों में सात का भंडार अगले एक दशक तक समाप्त हो जाएगा और इसके कारण ही तिब्बत से खनिजों का निष्कर्षण काफी तेजी से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ रहा है। खनन गतिविधियों के बढ़ने से वनस्पतियों के क्षेत्रफल में कमी हो रही है जिसके कारण भीषण भूस्खलन, व्यापक मृदा अपरदन, वन्यजीवन पर्यावास को क्षति और नदियों व जलधाराओं के प्रदूषण में वृद्धि हुई है।

    नाभिकीय कचरे का जमाव
    कभी भारत व चीन के बीच शांतिपूर्ण अंतःस्थ राज्य (बफर स्टेट) के रूप में स्थित तिब्बत का आज इस हद तक सैन्यीकरण हो चुका है कि वहां कम से कम तीन लाख चीनी सैनिक हैं और चीन के कुल नाभिकीय मिसाइल का लगभग एक चौथाई हिस्सा यहां तैनात है। चीनियों द्वारा तिब्बत में पहला नाभिकीय हथियार १९७१ में लाया गया।

    आज, ऐसा लग रहा है कि चीनी शासक तिब्बत को अपने देश के व विदेशी, दोनों तरह के नाभिकीय हथियारों के कूड़ेदान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। १९८४ में चीनी नाभिकीय उद्योग निगम ने १५०० डॉलर प्रति किलोग्राम की दर से पश्चिमी देशों के नाभिकीय कचरे के निस्तारण का प्रस्ताव रखा था।
    चीनी नाभिकीय भंडार स्थलों के आसपास रहने वाले तिब्बतियों और पशुधन के रहस्यमय मौतों की रिपोर्ट मिली है, साथ ही कैंसर व जन्मगत दोषों के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा जलस्रोतों के प्रदूषण के मामले भी सामने आए हैं। इसका चिंताजनक पहलू यह है कि स्थानीय चीनी जनसंख्या को इन स्रोतों के जल के उपयोग न करने की चेतावनी दी जाती है, लेकिन स्थानीय तिब्बतियों को इस प्रकार की चेतावनी नहीं दी जाती। तिब्बत के पठार की संवेदनशील पारिस्थितिकी अथवा उस भूमि के हकदार निवासियों के प्रति किसी प्रकार की परवाह किए बिना चीन उस पर अपना नियंत्रण जारी रखे हुए है।