• दलाई लामा के अरुणाचल दौरे का चीनी विरोध

    KHABARINDIA TV.Com, 10 अप्रैल, 2017

    तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की इस बार की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को पहले के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से लेते हुए चीन ने पिछले सप्ताह बुधवार को कहा कि भारत ने उसके साथ अपने संबंध खराब कर लिए हैं। चीन ने बहुत सख्त अंदाज में यह भी कहा कि अब सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ेगा। चीन ने आधिकारिक रूप से भी अपना विरोध दर्ज कराया। उसने बीजिंग में तैनात भारत के राजदूत विजय गोखले को बुलाकर विरोध दर्ज कराया।

    चीन ने दलाई लामा की यात्रा की शुरुआत में ही कहा था कि इससे दोनों देशों के संबंधों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। भारत ने इसका जवाब देते हुए कहा कि चीन को भारत के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। इस बीच अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चीन को नाराज करने वाला बयान देते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश की सीमा सिर्फ तिब्बत से लगती है।

    उनके इस बयान से ऐसा संदेश गया है कि भारत ‘एक चीन’ की नीति को नहीं मान रहा है। तिब्बतियों के पवित्र धर्मगुरु दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन के विरोध को भारत ने खारिज कर दिया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि दलाई लामा तवांग सहित राज्य के अन्य इलाकों में आध्यात्मिक व धार्मिक यात्रा पर है। इस बीच दलाई लामा अपनी नौ दिवसीय अरुणाचल यात्रा पर पिछले सप्ताह मंगलवार को सडक़ मार्ग से पश्चिम कामेंग जिले में बोमाडिला पहुंचे।

    चीन का नाम लिए बिना विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यात्रा पर बनावटी विवाद नहीं खड़ा करना चाहिए। दलाई लामा की यह पहली यात्रा नहीं है। इसके पहले भी वे सात बार अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग इलाकों का दौरा कर चुके हैं। उनका आखिरी दौरा वर्ष 2009 में हुआ था। उधर गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा है कि भारत एक चीन नीति का सम्मान करता है। हम चीन से भी इस तरह की उम्मीद करते हैं।

    विदेश मंत्रालय ने कहा कि दलाई लामा धार्मिक गुरु है। उनका भारतीय बहुत आदर करते हैं। उनकी यात्रा को कोई रंग नहीं दिया जाना चाहिए। वे अपने आध्यात्मिक और धार्मिक गतिविधियों के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करते हैं। उधर चीन की सरकारी मीडिया ने कहा कि भारत बीजिंग को परेशान करने के लिए दलाई लामा के तवांग दौरे का इस्तेमाल कर रहा है।

    नई दिल्ली को तिब्बत से संबंधित अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का पालन करना चाहिए। इस प्रकार दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा को लेकर एक बार फिर भारत और चीन आमने-सामने है। दलाई लामा जब तक अरुणाचल में रहेंगे तब तक दोनों तरफ से जुबानी जंग चलती रहेगी। जैसा कि ऊपर लिखा गया है, दलाई लामा पहले भी आते रहे हैं और हर बार दोनों के बीच पहले भी ऐसी बयानबाजी हुई है। चीनी सैनिकों के भारत की सीमा में घुसने और अपना झंडा गाडने की घटनाएं भी हुई है, लेकिन कभी इन पर सैन्य विवाद नहीं हुआ है।

    यह दोनों देशों की समझदारी को दिखाता है कि सीमा विवाद को दोनों बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। आखिरी बार दोनों 1962 में लड़े थे और तब चीन ने अरुणाचल प्रदेश का इलाका कब्जा कर लिया था, लेकिन वे एक तरफा युद्ध विराम के बाद वहां से वापस लौट गए थे। उस समय चीन ने भारत के बिल्कुल उत्तरी सिरे पर स्थित अक्साई चिन में और पूर्वी हिस्से में अरुणाचल प्रदेश में लड़ाई लड़ी थी।

    भारत उस लड़ाई में बुरी तरह हारा था और उसकी ग्रंथि आज तक हर भारतीय के मन में है। चीन विजेता रहा था और उसे लेकर उसमें सर्वोच्चता का भाव अब भी है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को निपटाने के लिए 20 दौर से ज्यादा की बातचीत हो चुकी है। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोबाल और चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यंग जिची के बीच लगातार बातचीत हो रही है।

    दोनों देशों में नेतृत्व बदलते रहने के बावजूद यह समझ बनी है कि सीमा विवाद का सैन्य समाधान संभव नहीं है। भारत इस बात को चीन के संदर्भ में भी समझ रहा है और पाकिस्तान के संदर्भ में भी। पाकिस्तान के साथ अब तक हुई सारी लड़ाइयों में भारत जीता है, लेकिन भारत की ओर से इस बात की कोशिश नहीं हुई कि सैन्य ताकत के दम पर उसके कब्जे वाले पाकिस्तान को छुड़ाकर भारत में मिला लिया जाए।

    हालांकि पाक अधिकृत कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश व अक्साई चिन का मामला अलग-अलग है। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। हैरानी की बात है कि 1962 में इस इलाके को कब्जे में लेकर चीन ने छोड़ दिया था और उसके बाद से लगातार वह इसे हासिल करने की कोशिश कर रहा है। उसने भारत के दूसरे राज्य सिक्किम पर अपना दावा छोड़ दिया। 1975 में जब इस बौद्ध मठ वाले इलाके को जनमत संग्रह के जरिए भारत में मिलाया गया था तब चीन ने इस जनमत संग्रह को खारिज कर दिया था।

    लेकिन 2003 में भारत और चीन के बीच जो संधि हुई, उसमें उसने एक तरह से सिक्किम पर से अपना दावा छोड़ दिया और उसे भारत का राज्य मान लिया गया। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इसे अपने देश के नक्शे से हटा दिया। लेकिन अरुणाचल प्रदेश को लेकर उसने ऐसा नहीं किया। उलटे अरुणाचल प्रदेश और खासकर इसके तवांग मठ के हिस्से को हासिल करने के लिए चीन लगातार कोशिश कर रहा है।

    लेकिन भारत के लिहाज से भी तवांग का खासा महत्व है। तिब्बती बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए यह भावनात्मक मुद्दा है। भारत हमेशा दलाई लामा का समर्थन करता रहा है। ऐसे में वह तवांग पर चीन का कब्जा नहीं होने दे सकता। इसके अलावा रणनीतिक और सामरिक रूप से भी यह भारत के लिए बेहद अहम है। इसलिए तवांग को बचाए रखते हुए चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने की जरूरत है।

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