• भारत- चीन- तिब्बत त्रिकोण

    माधुरी संतनाम सोंधी, मेनस्ट्रीम वीकली

    ऐतिहासिक और रणनीतिक पृष्ठभूमि

    भारत-चीन क्षेत्रीय विवादों में तिब्बत के महत्व के बारे में,  शायद मैं खुद कुछ परिचित तथ्यों का स्मरण कर शुरू कर सकती हूं!

    1. समकालीन समय में और मैं इस पर जोर देती हूं क्योंकि यह हमेशा ऐसा नहीं था कि तिब्बत, चीन और भारत के बीच एक रणनीतिक त्रिकोण गठि‍त हो गया है- हाल के इतिहास और भूगोल द्वारा निर्देशित एक ऐसी त्रिकोणीयता, जिसने तिब्बत को पानी और खनिज संसाधनों जैसी भारी प्राकृतिक संपदा से संपन्न किया है।
    2. तिब्बत अपने इन संसाधनों के साथ चीन की क्षेत्रफल के विस्तार को काफी बढ़ाता है, उसकी घनी आबादी के रहने के लिए क्षेत्राधिकार या रहने की जगह प्रदान करता है और विशेष रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में उसे अत्यधिक रणनीतिक लाभ पहुंचाता है।
    3. यद्यपि समकालीन समय में चीन और भारत दोनों को सभ्यता मूलक देश के रूप में वर्णित किया जाता है। लेकिन जहां भारत एक सलाद के कटोरे की तरह है, जिसमें एक समग्र एकता में विविधता फैली हुई है, वहीं चीन बहुत कम अल्पसंख्यकों की विविधता के साथ वीभत्स तरीके से मिश्रित सूप की तरह है, जिसे वह बलपूर्वक एकरूप बनाने को एक अनिवार्य आवश्यकता मानता है।
    4. अगर आज जारी की गई रिपोर्ट 1 को माना जाए तो तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं था। तब चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा स्पष्ट तौर पर साम्राज्यवादी गुंडागर्दी से कम कुछ भी नहीं था। लेकिन इसका विरोधाभासी रूप है, जैसा कि हन्ना अरांड्ट कहते हैं- साम्राज्यवाद शब्द के मायने समुद्र पार के देशों पर कब्जा करने को लेकर ही लगाया जाता है। साथ  में  लगी भूमि का अपहरण किसी भी तरह इस श्रेणी में नहीं आता है। इसलिए जब चीन ने तिब्बत या मंगोलिया पर कब्जा कर लिया,  या जब तत्कालीन सोवियत संघ ने मध्य एशिया के देशों को अपने में मिला लिया या पूर्वी यूरोप के देशों को अपने नियंत्रण में ले लिया, तो इस पर दुनिया भर  में ठीक वही  नजरिया और प्रतिक्रिया नहीं हुई  जैसा कि समुद्र पार जाकर और प्रशांत पार  के  देशों को उपनिवेश बनाने के लिए यूरोपीय शक्तियों का तिरस्कार हुआ।
    5. तिब्बत पर उसके लगभग 60 वर्षों के कब्जे के बाद चीन इस सैन्य कब्जे का औचित्य ठहराने के लिए कम्युनिज्म और मुक्तिकरण की भाषा का इस्तेमाल करता है। चीन द्वारा बौद्ध धर्म का ठप्पा लगाने और पठार को नियंत्रित करने के अपने क्रूर प्रयासों के दौरान  तिब्बतियों ने अपनी आबादी का एक-छठा हिस्सा खो दिया। तिब्बत  निवासियों के बड़े पैमाने पर उत्पीड़न,  मठों का विनाश, भिक्षुओं- भिक्षुणियों और आम  आदमी के निर्वासन के बावजूद  वैचारिक रूपांतरण में चीन के प्रयास पूरी तरह से विफल रहे हैं। इस कठोरता ने उल्टे चीन को ही अपने कट्टर मार्क्सवाद से दूर किया है। अन्य बातों के अलावा चीन में जो हुआ वह यह कि चीन लामा पुनर्जन्म सहित तिब्बती धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने, तिब्बती भाषा की जगह चीनी भाषा को स्थापित करने और आर्थिक नुकसान और जबरन नसबंदी के माध्यम से स्थानीय आबादी को नियंत्रित करने में विफल रहा। इसके लिए चीन से अपनी हान आबादी को बेतहाशा तरीके से तिब्बत  में बसाया लेकिन वह भी बेकार गया।
    6. उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आज जारी की गई रिपोर्ट में जिन तरीकों को विस्तार से बताया गया है, उनमें- चीनी प्रांतों में तिब्बती लोगों का कट्टरपंथी पुनर्गठन या जेरमैंडरिंग, स्थानीय प्रशासन पर चीनी मूल के लोगों का आधिपत्य, भूमि और संपत्तियों का राज्य द्वारा अधिग्रहण, मानव अधिकारों का दमन, तोड़फोड़, अगर तिब्बती संस्कृति का चीनीकरण नहीं होता है तो पठार का सैन्यीकरण  और अंतिम तरीका चीनी आबादी का बड़ी संख्या  में तिब्बत  में घुसपैठ शामिल है।
    7. अपने नास्तिकवाद के बावजूद चीन तिब्बत के बौद्ध धर्म के पूरे धार्मिक-सांस्कृतिक दुनिया की राजनीति और इलाके पर दावा करता है। इनमें सिस-हिमालय के क्षेत्रों जैसे अक्साई चिन या लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश पर जो सीधे तौर पर तो ल्हासा से शासित नहीं रहे हैं, लेकिन तिब्बती मठों और तिब्बती धार्मिक केंद्रों के साथ जुड़े रहे हैं। इसी तर्क से वह कल भारत के कर्नाटक, हिमाचल, ओडिशा और अन्य राज्यों  में स्थित तिब्बती बस्तियों पर दावा कर सकता है।
    8. जैसा कि तिब्बतशास्त्री इलियट स्पर्लिंग कहते हैं, भारत, तिब्बत, चीन के बीच सीमा के दावे आज भाषागत विवादों में उलझे हुए हैं और आधुनिकता के पुनरीक्षण के नाम पर कई चीजें चुनिंदा मामलों में निराकार रूप में लादा जा रहा है और सत्ता और रीति रिवाजों के ऐतिहासिक परिदृश्य बदला जा रहा है। इस तरह, जब चीन ने सदियों तक इस बात को स्वीकार किया है कि तिब्बत और मुख्य भूमि वाला चीन कुछ झगड़ों और मतभेदों के बावजूद एक सहज इकाई थे और केवल तथाकथित अपमान की सदी के दौरान भ्रम और कमजोरी की अवधि के दौरान ही अलग रहे, ऐसे में तिब्बती न केवल एक अलग नस्लीय जमात और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले जमात हैं बल्कि उनका एक स्वतंत्र इतिहास भी है। तिब्बत का प्रारंभिक इतिहास एक सक्रिय सैन्य शक्ति के रूप में है, जब 8 वीं शताब्दी में राजा सोंगत्सेन गम्पो ने चीन की तत्कालीन राजधानी च्यांग-ए (वर्तमान ज़ियान) पर विजय प्राप्त की थी। वहां के राजा द्वारा तिब्बती बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेने के बाद गम्पो ने युद्ध बंद कर दिया और तिब्बती लामा उसके कई आक्रामक पड़ोसियों के भी आध्यात्मिक गुरु बन गए। इसी तरह संबंधित राष्ट्रों के बीच राजनीतिक शक्ति की सनक से अलग दलाई लामा और मंचू राजाओं के बीच चो-योन संबंध 19 वीं शताब्दी तक बना रहा। अफसोस की बात है कि अंग्रेजों ने चो-यान संबंधों की व्याख्या करने के लिए इस संबंध में से सांस्कृतिक संदर्भ से हटाकर इसे राजनीतिक रूप से सपाट सिद्धांत स्थापित कर दिया जिसमें आंतरिक रूप से स्वायत्त राज्य पर संप्रभुता स्थापित करने की पश्चिमी अवधारणा है।
    9. रिकॉर्ड के लिए, आधुनिक संदर्भ में तिब्बत की संप्रभुता को 1642 में कश्मीर (चीन के मिंग शासन के दौरान) के रूप में और लद्दाख को लेकर 1852 में और महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1894 में (मंचू शासन के दौरान) की गई संधियों से अलग माना गया था। 13 वें दलाई लामा द्वारा तिब्बत को संप्रभु संपन्न स्वतंत्र देश घोषित करने की 1913 की घोषणा के बारे में कोई विवाद नहीं है। इसी तरह 1913 में तिब्बत और मंगोलिया के बीच हुई संधि और 1914 में चीन के साथ-साथ ब्रिटिश भारत के साथ शिमला समझौते में भी तिब्बत की भागीदारी महत्वपूर्ण है। इस बात पर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा कि जब पड़ोसी शक्तियों से पराजित हो गया तब भी तिब्बत पर उनमें से किसी शक्ति का इस तरह से सीधा शासन नहीं हुआ था। कहते हैं, भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा ग्राम स्तर तक पर शासन किया जाता था। ल्हासा में तैनात चीनी दूत वायसराय नहीं होता था बल्कि एक मजबूत शक्ति के प्रभावशाली राजदूत के रूप में रहता था। और संभवत: उन्होंने दलाई लामा के स्वर्णिम चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश की हो, जिसमें वे कभी सफल हुए या नहीं हुए हों लेकिन किसी भी मायने में वे देश पर शासन कतई नहीं करते थे।

    वर्तमान गतिरोध

    वेस्टफेलियन संधि से पूर्व भारत-तिब्बत सीमा का इस्तेमाल तिब्बतियों और भारतीयों की पीढ़ियों द्वारा व्यापार, तीर्थयात्रा, धार्मिक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था। लेकिन मैकमोहन रेखा तय होने और चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद यह एक विवाद का विषय बन गया है।

    भारत और चीन के बीच क्षेत्रीय विवाद के संबंध में ऑस्ट्रेलियाई रक्षा कॉलेज का एक प्रकाशन दिखाता है कि कैसे तिब्बत और तिब्बती भारत और चीन के बीच एक रणनीतिक गतिरोध के केंद्र के रूप में उभरे हैं जो ‘अपेक्षाकृत स्थिर है लेकिन तनावपूर्ण सुरक्षा स्थिति’ को जन्म देता है।

    इसमें कम गतिरोध वाले तिब्बती उप-त्रिभुज के रूप में वर्णित किए जा सकनेवाले क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। इसमें निर्वासित दलाई लामा को मान्यता, सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के तहत आनेवाले तिब्बत के अंदर रहनेवाले तिब्बतियों और भारत व दुनिया में अन्य देशों में रह रहे शरणार्थी तिब्बतियों को मान्यता देना शामिल है। तिब्बत में तत्काल वापसी के लुप्त होते सपने के साथ, कई निर्वासित तिब्बती उन नए देशों की नागरिकता प्राप्त कर रहे हैं, जहां वे शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं।  लेकिन वे अभी भी अपने देश के मूल के लिए मुखर और सक्रिय प्रचारक बने हुए हैं। दरअसल सीटीए  एक सक्रिय विदेश नीति विभाग भी चलाता है। अगर कोई अनौपचारिक कूटनीति और प्रचार के अलावा तिब्बती मुख्य भूमि के लिए जानकारी रखता है या इसकी बातें कहता है, तो निश्चित तौर पर वह मुश्किल में है।

    भारत अपनी उत्तरी सीमा पर चीन की उपस्थिति के प्रति बहुत ही सुस्त स्थिति में है। यह भी प्रकट नहीं होता है कि उसने तिब्बत या सीमा समस्या को कुछ समाधान पर लाने के प्रयास में बहुत तत्परता दिखाई है। जैसा कि होता है, तिब्बत एकमात्र प्रभावी कार्ड है जिसे भारत चीन के खिलाफ खेल सकता है, विशेषकर 1962 में उसकी सैन्य हार के बाद। लेकिन इस बात की कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं है कि उसने 1962 से पहले संयुक्त राष्ट्र में तिब्बत के मुद्दे को उठाने से परहेज क्यों  किया। बल्कि सकारात्मक रूप से अन्य देशों को भी ऐसा करने से उसने हतोत्साहित किया। (और न ही उसने एशियाई मंचों पर इस मुद्दे को उठाया।)

    आज भारत चीन के सैन्य तंत्र के मुकाबले कहीं नहीं है। न केवल चीन के पास अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे मजबूत सेना है, बल्कि तिब्बत के उच्च पठार पर अब हवाई अड्डों, रेलवे और सड़क संचार के साथ मिलकर उसे एक अतुलनीय भौगोलिक और रणनीतिक बढ़त प्रदान करता है।  हाल में भारत ने सीस-हिमालय क्षेत्र में अपने बुनियादी ढांचे और संचार में सुधार करने और अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास किए हैं, लेकिन उसे अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

    भारत, चीन और तिब्बत की पहल

    चीन को भारत पर संदेह है कि वह अभी भी एक स्वतंत्र तिब्बत के विचारों को शरण देता है। इस प्रकार भारत-चीन सीमा वार्ता के प्रत्येक सत्र में वह भारत से चीन के हिस्से के रूप में तिब्बत की अपनी मान्यता को औपचारिक रूप से घोषित करने के लिए कहता है, हालांकि भारत अपने हिस्से के सिस-हिमालयी राज्यों की पारस्परिक मान्यता प्राप्त करने में कामयाब नहीं हुआ है – सिक्किम पर भी नहीं। केवल जब वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीन से यह घोषणा करने में विफल रहीं कि पीओके भारत का हिस्सा है – एक ऐसा क्षेत्र है जहां पाकिस्तान और चीन दोनों ही भारतीय क्षेत्र पर दावा करते हैं – ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि भारतीय पक्ष ने चीन को बाध्य करना बंद कर दिया।

    यह याद किया जा सकता है कि 10 अगस्त, 2013 को श्याम शरण की रिपोर्ट पर काफी हंगामा हुआ था । इसमें पिछले वर्षों के दौरान 654 वर्ग किलोमीटर सीमा क्षेत्र में 5 सुराख होने की बात की गई है। भारत सरकार के राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब के अनुसार, भारत में चीनी अतिक्रमण 2016 में 273 से बढ़कर 2017 में 426 हो गया। चीनी सैनिकों का सबसे जबर्दस्त अतिक्रमण  2014 में उस समय हुआ था जब प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में राष्ट्रपति शी की मेजबानी कर रहे थे ।

    कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि चीन तिब्बत में अपने अधूरे व्यवसाय को देखते हुए, अब भारत के साथ एक अपरिभाषित सीमा को प्राथमिकता देता है। यह पठार पर उसकी विशाल सैन्य उपस्थिति और उसके निवासियों पर उसकी कड़ी पुलिस निगरानी का औचित्य ठहराता है। सीमा विवाद को जीवित रखकर वह निर्वासित तिब्बतियों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने के लिए भारत पर दबाव डाल सकता है, जिसके बारे में वह बेहद संवेदनशील है। वह भारत के नए क्षेत्रों पर दावे कर सकता है। उदाहरण के लिए, अरुणाचल में 2005 के अंत में उसने अपना दावा ठोक दिया।

    जहां तक कि भारत की ओर से कार्रवाई की बात है उसने तिब्बती शरणार्थियों को अपने यहां रख  रखा है और जब कभी भी वैसा मौका आता है, वह इन तिब्बतियों को चीन  के खिलाफ आवाज उठाने की  अनुमति देता रहता है। इसी  कारण से चीन निर्वासितों को शरण देने में भारत के इरादों पर संदेह करता है। उसका यह विश्वास है कि भारत तिब्बती  अलगाववाद को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा करता है- और इसीलिए वह लगातार मांग करता आ रहा है कि इन तिब्बतियों की राजनीतिक गतिविधियों पर भारत अंकुश लगाए।

    डोकलाम में हालिया गतिरोध इस आपसी वैमनस्य का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुगत करता है। नई भारत सरकार ने डॉ लोबसांग सांगेय को प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करके काफी मजबूत तरीके से अपनी ओर से शुरुआत की और परम पावन दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने के लिए प्रोत्साहित किया जहां उनका बहुत गर्मजोशी और आदर के साथ स्वागत किया गया। इससे अरुणाचल को ’दक्षिणी तिब्बत’ का दावा करने वाले चीनियों को खतरे के संकेत मिले और उन्होंने डोकलाम में अतिक्रमण शुरू कर दिया। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवा) प्रकाश मेनन और अनिरुद्ध कनिसेट्टी ने इस प्रकरण का वर्णन किया है, जो आधिकारिक प्रचार के विपरीत है और जिसका समापन भारत के लिए प्रतिकूल रूप में होता है। निश्चित रूप से तब से भारत इस क्षेत्र में दलाई लामा की यात्राओं के संबंध में कहीं अधिक चौकस रहा है  और नई दिल्ली ने तिब्बती ‘थैंक यू’ आयोजन को रद्द करा दिया है। इस पर बहुत ज्यादा कुछ  कहने को नहीं है। चीनी प्रतिनिधि की आपत्तियों को धन्यवाद जो उन्होंने  मंत्री किरेन रिजुजू को अरुणाचल के संबंध में भारत-चीन द्विपक्षीय सुरक्षा वार्ता में भाग लेने को  लेकर दर्ज कराई। इसपर उहापोह रहा  कि उन्हें  इस वार्ता में भाग लेना चाहिए या नहीं। (अंतत: उन्होंने भाग लिया)। यह आरोप लगाना आसान हो सकता है कि मोदी सरकार के ‘उकसावे’ की वजह से ही डोकलाम संकट पैदा हो गया था। लेकिन असलियत है कि यह रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाके में स्थित है और लंबे समय  से चीन, भारत, भूटान के बीच विवाद का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है। लेकिन घटना का समय और वुहान बैठक के बाद तिब्बतियों के प्रति भारत का व्यवहार- से लगता है कि  चीन अपना संदेश देने में सफल रहा है।

    चीन को भारत के खिलाफ अपना अनुकूल कार्ड परमाणु संपन्न पाकिस्तान के रूप में मिल गया है जो उसका लंबे समय से सहयोगी भी रहा है। पाकिस्तान सेना के प्रभावी नियंत्रण के तहत है और कई आतंकवादी संगठनों को पालकर रखता है। घाटी में मौजूदा संकट के अलावा, पाकिस्तान ने सिंध में चीन को बड़ा इलाका सौंप दिया है अपने इलाके से  होकर चीन  के बेल्ट एंड रोड पहल को अनुमति दे दी है – हालांकि बेल्ट  एंड  रोड  पहल  को  लेकर पाकिस्तान  के  कुछ  हिस्सों में असंतोष के स्वर  भी  उभर रहे हैं। प्रो एम.एल. सोंधी का कहना है कि भारत ने हमेशा गलत तरीके से पाकिस्तान को अपना मुख्य सुरक्षा खतरा माना जाता है  और भरत कर्नाड ने अपने हालिया प्रकाशन ‘स्टैगरिंग फॉरवर्ड’ में भी परमाणु संपन्न पाकिस्तान को अति खतरा मानने की आलोचना की है।

    ऐसा हो सकता है कि न तो चीन और न ही भारत ने पिछली आधी सदी में भारत की उत्तरी सीमा पर यथास्थिति को बिगाड़ने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई हो। भारत चीन के सैन्य दुस्साहस से खुद को बचाने के लिए चीन के अनुकूल मजबूत व्यापार संबंध बनाए रखता हो। बार-बार सुई चुभोने और बदतर स्थिति होने के बावजूद  दोनों देशों के बीच कुल मिलाकर स्थिति ऐसी  बनी  प्रतीत होती है कि दोनों देश सीमा पर अतिक्रमण के मामले में यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

    नई पहल और भविष्य

    1962 से अब तक भारत-चीन के बीच स्थिरता लगभग बनी हुई है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह नवीनतम भारत-चीन ‘रीसेट’ के बावजूद जारी रहेगा। हालांकि बीजेपी सरकार 2019 के चुनावों के  ठीक  पहले इस तरह की एक दुर्घटना को आमंत्रित करना नहीं चाहेगी, लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश कटोच ने अनुमान लगाया है कि चीनी शायद यह चाहते हैं कि घटनाएं और परिस्थिति उनके अनुरूप हो।

    हालाँकि, यथास्थिति में कुछ नए हलन-चलन के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन यह सब कहाँ तक ले जाएगा यह अभी तक किसी को अनुमान नहीं है।

    1. अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में किसी समय परम पावन ने दुनिया के लिए एक नई मध्यम मार्ग नीति की घोषणा की थी- इसके तहत पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को का त्याग करते हुए तिब्बत के लिए ‘वास्तविक स्वायत्तता’ के लिए संशोधित करने की नीति अपनाई गई। इसके बाद चीन को कई तथ्य-खोज और खोजपूर्ण तिब्बती मिशन मिले, लेकिन उन्होंने इससे कुछ भी हासिल नहीं किया।
    2. अभी हाल ही में 2017 में सीटीए ने फाइव-फिफ्टी विजन लॉन्च किया, जिसे ‘अच्छाई के प्रति आशावान और बुराई से मुकाबले के लिए तैयारी’ की नीति के रूप में जाना जाता है। इस विज़न-स्टेटमेंट का उद्देश्य अगले पांच साल के लक्ष्य में मध्यम मार्ग के दृष्टिकोण के आधार पर तिब्बत मुद्दे को हल करने के सीटीए के प्रयासों को अधिक से अधिक तेज करना है। सीटीए का लक्ष्य चीन के भीतर तिब्बत को एक राजनीतिक इकाई के तौर पर स्था्पित करना है, जिसमें वास्तविक क्षेत्रीय स्वायत्तता होगी और जिसे एक शांत क्षेत्र के रूप में बनाए रखा जाएगा। इसके अलावा लंबे समय से चली आ रही अन्य मांगों में पठार का विसैन्यीकरण, आंतरिक सुरक्षा और पर्यावरण के लिए चीन द्वारा जिम्मेदारी का वहन, तिब्बती को मुख्य भाषा के रूप में बनाए रखना और सभी अवैध आप्रवासियों (जिनमें ज्यादातर हान मूल के हैं) को पठार से बाहर हटाना शामिल है। आदर्श रूप से और स्थानीय तिब्बतियों द्वारा स्वीकृति के आधार पर वे चाहेंगे कि वे अपने अनुभव के आधार पर लोकतंत्र को तिब्बत में बहाल करें। इस दृष्टिपत्र में परम पावन के अपने ‘आधिकारिक घर’ में वापसी की भी बात की गई है। तिब्बत अब वैसा ही देश नहीं है जैसा कि साठ साल पहले हुआ करता था। पुनर्गठित और नक्काशीदार टीएआर में अन्य क्षेत्रों के साथ, जैसे कि आमदो को तीन हिस्सों में बांट कर इसे चीन के प्रांतों के साथ पुनर्गठित कर दिया गया है, इस प्रकार बातचीत के लिए एक बहुत बड़ा एजेंडा है।
    3. इसी तरह से विज़न का कहना है कि तिब्बती स्वतंत्रता संग्राम को बनाए रखने के लिए निर्वासन अनुकूल माहौल पैदा करता है और यदि आवश्यक हो तो तिब्बती संस्कृति को निर्वासन में अगले पचास वर्षों के लिए संरक्षित रखा जाएगा।
    4. अंतिम प्रयास के तौर पर कहा जाता है कि सीटीए के पूर्व प्रमुख समदोंग रिन्पोछे ने दलाई लामा की तिब्बत यात्रा की संभावनाओं का पता लगाने के लिए बीजिंग के प्रतिनिधियों से मुलाकात की है और हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात की अल अरबिया में 21 अक्तूबर को छपी रिपोर्ट के अनुसार (जो भारतीय प्रेस द्वारा उठाया नहीं गया), पांच सदस्यीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख ने पुष्टि की कि चीन के साथ भारत सरकार के समर्थन से वार्ता चल रही है। यह चीन, भारत और तिब्बत द्वारा गतिरोध को तोड़ने के लिए समन्वित खोजपूर्ण प्रयास का संकेत देता है।

    निष्कर्ष

    भारत-चीन विवाद के केंद्र में तिब्बत की उपस्थिति निर्विवाद है।

    1. चीन व्यवहार में (हालांकि सिद्धांत रूप में नहीं) स्वीकार करता है कि भारत और चीन के बीच की सीमा भारत और तिब्बत के बीच की सीमा है।
    2. दलाई लामा की मध्यम मार्ग नीति का उद्देश्य तिब्बत के लिए स्वायत्तता और सांस लेने की जगह को जीतना है, जो चीन और भारत के बीच बेहतर संबंधों में भी योगदान देगा। अगर तिब्बत में शांति और विसैन्यीकरण हो जाता है तो हर पर्वत की ऊंचाई और हिमालय की सीमा में गुजरना विवाद रहित होगा। लेकिन यह देखते हुए कि चीनी कम्युनिस्ट राज्य हांगकांग के लिए एक-देश दो प्रणालियों के सौदे को कमजोर कर रहा है। ऐसे में  यह स्पष्ट नहीं है कि वह तिब्बत के लिए किसी भी प्रकार के वास्तविक संघीय या लोकतांत्रिक ढांचे के लिए तैयार होगा।
    3. इसके अलावा वर्तमान चीनी शासन अपने हितों के दूरगामी नेटवर्क और गहन आंतरिक नियंत्रणों के कारण ऐतिहासिक मिसालें देते हुए, अर्थव्यवस्था, विचारधारा, क्षेत्र जो भी हो की मजबूरियों के खिलाफ आने वाले मुद्दों के खिलाफ आ सकता है। यह सर्वविदित है कि पिछली शताब्दी में सोवियत संघ और ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली लेकिन बोझिल शासन के दौरान ये मुद्दे कमतर किए गए थे।

    अंत में, यह सबसे महत्वपूर्ण बात है- न केवल तिब्बतियों के लिए,  बल्कि उन सभी के लिए जो चीन के साथ संबंध रखते हैं और आज आर्थिक दबदबे में आ गए हैं- कि  उन्हें  चीन  के राजनीतिक एजेंडे, शब्दावली और उनके तौर-तरीकों को विशेष रूप से उसके अंतरराष्ट्रीय व्यवहार को समझना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण है कि उन सारी प्रक्रिया को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के तहत पूरा करना चाहिए, जिसमें चीन एक हस्ताक्षरकर्ता है,  लेकिन जो चीन के मध्य साम्राज्य-केंद्रित अवधारणाओं से मेल नहीं खाते हैं। यदि चीन व्यवहार में मध्य साम्राज्य क्षेत्र,  भाषा,  संस्कृति या जो कुछ भी है,  उसके संबंध में साम्राज्यवादी व्यवहार को मजबूर करता है, तो इसके लिए आवश्यक है कि उसे धोखा करार दिया जाए। दूसरी शब्दावली का उपयोग करके सामने वाले ने पहले ही उसके आधे तर्क को स्वीकार कर लिये हैं। चीन इसे बहुत अच्छी तरह से समझता है और लगातार अपने स्वयं के आख्यान को उन कार्यों को कवर करने के लिए दोहराता है जिन्हें विश्व व्यवस्था के खिलाफ माना जा सकता है। जैसा कि फादर बोचेंस्की, एसजे ने मेरे तिब्ब्त पर एक छोटी सी प्रस्तुति देने के बाद मुझे सलाह दी थी- ‘कभी किसी और के टूथ ब्रश का उपयोग नहीं करना चाहिए।’ फादर बोचेंस्की साठ के दशक के मध्य में फ्राइबर्ग विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट ऑफ ईस्टर्न यूरोप नामक संस्थान चलाते थे।

    इस संदर्भ में मैं दलाई लामा के इस सिद्धांत पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि चीन द्वारा किए जा रहे ऐतिहासिक और भौगोलिक दावों का जवाब देने के लिए  इतिहास का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है। हांगकांग की सिटी यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर प्रो शियांग लियाऊ ने युआन (1279 -1368) और मिंग (1364-1644) राजवंशों के कुछ ऐतिहासिक अभिलेखों और मानचित्रों पर ध्यान आकर्षित किया है, जो दर्शाता है कि चीन ने कभी भी अपने राष्ट्रीय क्षेत्र में तिब्बत का चित्रण नहीं किया था। इसके बजाय, चीनी स्रोतों से उद्धृत करते हुए प्रो लियाऊ उल्लेख करते है कि तिब्बतियों को चीन के विभिन्न क्षेत्रों में वहां के निवासियों के साथ ‘विदेशी’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

    दलाई लामा ने मार्क्सवाद के समतावादी लोकाचार में अपनी रुचि दिखाई है और इसे बौद्ध दुनिया के दृष्टिकोण में एकीकृत करने की संभावना के बारे में भी कहा है। इस संबंध में मुद्दे को चीन ने पिछले महीने फुजियान प्रांत के पुतिआन में विश्व बौद्ध फोरम की बैठक की मेजबानी के दौरान कुछ हद तक लचीला रुख अपनाते हुए उठाया था। उनमें चर्चा का एक विषय यह भी था कि बौद्ध धर्म को समाजवादी समाज के अनुकूल कैसे बनाया जाए, विशेष रूप से इसे ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के साथ कैसे एकीकृत किया जाए। लेकिन शायद चीनी प्रस्तोता इस बात से अनजान थे कि यह ठीक पुराने सिल्क रूट के अनुरूप है जिसपर चीनी व्यापारी रेशम और चाय बाहरी देशों में ले जाते थे, और वापस उनकी संस्कृतियों को चीन में वापस लेकर आते थे, जिनमें से एक प्रमुख आयात बौद्ध धर्म था। यदि वह जागरूक था, तो वह वास्तव में एक मजबूत लेकिन विध्वंसक ऐतिहासिक जमीनी मामला बना रहा था।

    (नई दिल्ली में, सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा 29 अक्टूबर, 2018 को नई दिल्ली में आयोजित ‘चेंजिंग जिओ-पोलिटिक्स : व्हाई तिब्बत रिमेंस द कोर इश्यू इन इंडिया-चाइना रिलेशंस’ विषय पर पैनल चर्चा में दी गई टिप्पणियों के आधार पर।)

    Categories: मुख्य समाचार, लेख व विचार, समाचार

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *