• भारत-तिब्बत संबंधों की एतिहासिक पृष्ठभूमि

    भारत-तिब्बत संबंधों की एतिहासिक पृष्ठभूमि

    इतिहास भारत और तिब्बत के अनूठे सम्बन्धों की प्राचीनता का साक्षी है।  तिब्बत की अद्भुत और अनूठी संस्कृति हिमालय की सुरम्य प्राकृतिक सुषमा में जन्मी है। इसकी राज्य व्यवस्था, सांस्कृतिक परम्पराएं एवं बोध्दधर्म का सर्वग्राही सन्देश, एक ऐसे क्षेत्र में पुष्पित तथा पल्लवित हुआ, जो संसार के सामान्य कोलाहल से दूर था। सदियों से इस एकाकी प्रदेश में सम्पूर्ण मानव जाति के हित के लिए एक अत्यन्त समृद्ध संस्कृति का विकास हुआ, जिसने युद्ध की विभीषिकाओं को परे रखकर अनूठी विचार घराएं तथा दार्शनिक चिन्तन देकर उसे और वैभाशाली बना दिया। धर्म उनके जीवन का आधार था, तो कर्म उसकी व्यावहारिक पद्धति। यहां मानव को अकिंचन प्राणी बताते हुए कर्तव्य का पालन करते हुए आत्मचिन्तन को प्रमुखता दी गई है। तिब्बतवासी भौंतिक शरीर को मूलतत्व न मानकर त्याग, तपस्या, करूणा, ध्यान, प्राथना जैसे मनोभावों को जीवन के औदार्य का मूलमंत्र मानते हैं। इन्ही उदात्त भावों के सहारे जीव संसार सागर के वात्याचक्रों से उबर कर अपने कर्तव्य का पालन करता हुआ निर्वाण प्राप्त करता है।
    ऐसा ही जीवन अपने अहंकार को त्याग कर आत्मिक प्रयासों से पर्वतों जैसी दृढता धारण कर, घाटियों की गहराईयों जैसे सहनशक्ति के द्वारा पठारों सदृश ऊबड-खबड मार्ग पर चलता हुआ प्रशस्ति पथ पर तब तक बढता रहा है जब तक परिस्थितियों ने उसके मनोबल को झकझोर कर परिवर्तित होने के लिए विवश नहीं कर दिया।

    सम्बन्धों की प्रचीनता
    जनधारणा है कि भारत और तिब्बत के आपसी सम्बन्धों का श्रीगणेश बौद्धधर्म के तिब्बत में प्रवेश के साथ हुआ है। तिब्बत की प्राचीन परम्पराएं इसकी साक्षी भी हैं। बुस्तोन जैसे विद्वानों तथा एतिहासिक जनश्रुतियों ने तिब्बत की आनुवांशिकता के बारे में बताया है कि महाभारतकालीन वीर सेनायक रूपति के सेनापतित्व में कौरवी-सेना की एक टुकडी ने भागकर तिब्बत में शरण ली और वैवाहिक सम्बन्ध बनाए। इन वैवाहिक सम्बन्धों के चलते यहां एक नई जाति का जन्म हुआ, जेसे आर्य भोट के नाम से जाना जाता है। इन्ही तथ्यों का साक्ष्य देते हुए त्सिपोन वांगचुक देदेन शकप्पा ने अपनी पुस्तक ”तिब्बतः ए पालिटिकल हिस्ट्री”. में लिखा है कि आज भी तिब्बती विद्वान अपने को रूपति और उसके अनुचरों की ही संतान मानते है। वे पंडित शंकरपति के एक पत्र की साक्षी भी देते हैं जो भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के एक शती बाद का आंका जाता है। यही पत्र बाद में रूपति का अपने अनुयायियों के साथ तिब्बत में आकर बसने का विवरण भी देता है।

    भगवान बुद्ध की पावन भूमि
    तिब्बत में बौद्धधर्म का प्रवेश सीधा भारत से ही हुआ है। इसी कारण तिब्बतवासियों के मन में यह धारणा घर कर गई कि जो कुछ भी आर्य, पावन व श्रेष्ठ हैं उसकी उद्गम स्थली भारत भूमि ही है। उनकी इस आस्था के साक्ष्य भी हमें उनके चिन्तन, कला, कार्य-व्यवहार, धर्म, दर्शन और काव्य सभी में मिलते हैं।
    तिब्बत में बोद्धधर्म के प्रवेश को लेकर दो लोगों के नम स्वर्णाक्षरों में अंकित किए गए हैं। तिब्बत नरेश सोंगत्सेन गम्पो, जो सातवी सदी पूर्वार्द्ध में हुए और दूसरे ठ्रिसोंदेत्सेन, जो आठवी सदी के उत्तरार्द्ध में हुए थे।  तिब्बत में बौद्धधर्म का प्रचार सर्वप्रथम भिक्षु शान्तरक्ष्ित कमलशील तथा पद्मसंभव के द्वारा किया गया। उससे भी पहले भारत में मन-कर्म-वचन तीनों रूपों में बौद्धधर्म का विकास हो चुका था।
    बौद्ध रूत्रग्रन्थ-त्रिपटिक विनयसत्र और अभिधर्म का जब तिब्बत के जनमानस में प्रवेश हुआ और मौखिक रुप से विस्तार भी, तो प्रचार प्रसार पाते हुए इन ग्रन्थों ने तिब्बती संस्कृति और धर्म की नींव रखी और आज अतक चलती चली आने वाली उन्नत परम्पराओं का हस्तानतरण किया।
    तिब्बती दृष्टिकोण में जीवन का मूलाधार करूणा और दया है। तिब्बती अध्यात्म गुरू दलाई लामा को अवलोकितेश्र्वर का अवतार मानते है, जो अपनी परम पावन दृष्टि से लोगों के अन्तस में प्रवेश कर अधिकार कर लेते हैं। इनके बाद दूसरा अवतार वे ”पनछेन लामा”को मानते है, जो ज्ञान की ज्योति ‘ध्यानी-बुद्ध’ के रूप में इस कल्प के प्रतीक हैं। इन दो लामाओं के अतिरिक्त तिब्बती लामाओं में एसे कई अन्य अवतारी सिद्ध गुरूओं के नाम भी है, जिन्हें टुल्कू के नाम से जाना जाता है। इनके उल्लेख भी हमें तिब्बती वाड़मय में मिलते है। इन लामाओं का पृथ्वी पर अवतार दुखों से संतप्त मानवमात्र के कल्याण हेतु हुआ है।
    भारतीय मूल परम्परा पर आधारित होने के कारण तथा भारतीय पुनर्जन्म के दर्शन और अवतारवाद की धारणा के अनुरूप तिब्बत में बौद्धधर्म की स्थापना के बाद सच्चे अवतार के खोज की एक प्रक्रिया बनाई गई। उसमें अपने सच्चे लामा के इस धरा पर अवतार की वर्षों तक प्रतिक्षा करने के बाद एक विलक्षण, किन्तु गंभीर और विवेकपूर्ण-पद्धाति के नए दलाई लामा के पुनर्जन्म को निश्च्िात कर लिया जाता है। यह व्यवस्था न तो वंशानुगत परम्परा पर आधारित होती है और न ही वह मृत्यु को जीवन का अन्त मानकर नई काया प्रवेश की प्रक्रिया को स्वीकारती है। यह भारतीय कर्म के सिद्धान्त पर आधरित है। दलाई लामा का पुनर्जन्म पूर्व अवसान स्थली से ह.जारों मील की दूरी पर जाकर अवतार ग्रहण करता है और परम्परागत भारतीय मान्यता के अनुसार ही पुरानी काया को छोडकर नई काया में प्रवेश करता है, क्योंकि भारतीय दर्शन में मृत्यु को जीवन का अन्त न मानकर ने जीवन के आरंभ की प्रक्रिया ही माना गया है।
    शब्द ‘दलाई लामा’ भारतीय भाषा का न होकर मंगोल शब्द है, जो तिब्बत के ग्यात्सों अर्थात सागर का समानार्थक है ।

    मठ परम्परा
    तिब्बत में स्थित मठ भारतीय मठ परम्परा की ही अनुकृति हैं। सर्वत्र मठों की स्थापना तिब्बत और भारत के आत्मीय सम्बन्धों के साक्षी हैं। इन बौद्धमठों में प्रवेश करते ही दर्शनार्थी आत्मलीन होकर आत्मसाक्षात्कार की चेतना से भर उठता है। वह आत्मनिरीक्षण तथा आत्मचिन्तन की भावना से अभिभूत हो जाता है। वहीं पर प्राथना कक्ष के पार्श्र्व में स्थापित भगवान बुद्ध की विशालमूर्ति इस चराचर जगत की निस्सारता का बोध कराती है। इससे मानव और मन्दियों के प्रतीकों की एक नई व्यख्या मिलती है। जातक कथाओं पर आधारित यहां के भित्त् चित्र एक ओर तो भारत के अजन्ता के चित्रों की याद दिलाते हैं, और दूसरी ओर बंगाल के पाल कालीन प्रभाव को भी दिखाते हैं।

    साहित्यिक अंतरंगता
    भारतीय भाषाओं के एतिहासिक विकास क्रम के सन्दर्भ से हम देखें तो पाते हैं कि संस्कृत और पाली भाषा में जितना कार्य भारत में हुआ उसका तिब्बती भाषा में किया गया अनुवाद उपलब्ध है। यह अनुवाद एसी वैज्ञानिक विधि से भाषाविदों के द्वारा, दोनों ही भाषाओं से किया गया है कि यदि उसका फिर से वापस अनुवाद संस्कृत और पाली में किया जाए तो वह वैसा ही पुनः अनूदित हो जाएगा, जैसा कि अपने मूल रूप में था।
    यह भी सत्य है कि भारतीय बौद्धधर्म की शाखा ”महायान” का साहित्य सबसे पहले तिब्बत की प्रचीन भोट भाषा में ही लिखा गया और आज भी वह तिब्बत में संरक्षित है।
    इसके अलावा संस्कृत के कई एसे पाचीन ग्रन्थ हैं, जो आज भारत में तो उपलब्ध नहीं है, किन्तु तिब्बती भाषा में उनके अनूदित रूप वहां आज भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
    भारतीय मूल के सिद्धयोगियों की परम्पराएं आज भी तिब्बत के अभिलेखगारों, मठों, चित्रविथियों व पटों के रूप में अंकित व अवस्थित है।

    तिब्बत भारत की अन्तरात्मा
    तिब्बत देश भारत की अन्तश्चेतना का मूर्त जीता जागता स्वरूप है। दैनिक कार्य व्यापारों में हम देख सकते है कि हमारा धर्म तथा दर्शन, हमारी अनुभुति तथा अभिव्यक्ति किस तरह से हिमालय की सीमाओं को लांघ कर सुदूरवर्ती तिब्बत के निवासियों के तन, मन तथा अन्तःकरण पर छा गई है। यह परम्पराएं, उन्हें प्रेम, शान्ति, करूणा के भावों एवं आदर्शों से सराबोर करती हुई, आज भी उनकी सामुदयिक संस्थाओं, परम्पराओं और कार्य व्यापारों में देखी जा सकती हैं।

    आर्य वैदिक मंत्र
    पद्म में स्थित मणि के मंत्र ”ओम मणि पद्मे हुं” ने तिब्बत्वासियों को भक्ति और त्याग तथा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि संसार की बढ़ती हुई भोगवादी, भौतिकतावादी मनोभावनाओं को आध्यात्मिक ऊंचाइयों के शिखर पर पहुंचाया है। इस कारण तिब्बत के लोग भगवान बुद्ध के अमृत उपदेशों को आतमसात करके संसार के आवागमन से मुक्त होने के लिए, परिनिर्वाण की ओर अग्रसर होनें में सक्षम रहे हैं। आधुनातन भारतीय जनमानस में तिब्बती संस्कृति से सहयोग के प्रति एक उपेक्षा का साभाव अवश्य दिखाइ पडता है, पर तिब्बत में आज भी भारतवर्ष को सभ्यता के उद्गाम रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।