• 20 अप्रैल को ठीक साठ साल पहले दलाई लामा इसी दिन मसूरी पहुंचे थे

    तिब्बत.नेट, 20 अप्रैल, 2019

    मसूरी। मसूरी का सुरम्य पहाड़ी शहर तिब्बति‍यों के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि तिब्बत त्यागने के बाद भारत में तिब्बती आध्यात्मिक धर्मगुरु दलाई लामा का पहला घर यहीं पर बना था।

    तिब्बत से आने के बाद इसी पहाड़ी शहर में दलाई लामा के आवास की व्यवस्था की गई थी। इसके बाद ठीक 60 साल पहले 20 अप्रैल 1959 को ही वह अपने अनुयायियों के साथ मसूरी पहुँचे थे।

    दलाई लामा के साथ मसूरी के संबंध को याद करते हुए इतिहासकार गोपाल भारद्वाज कहते हैं, ‘जिस दिन वह मसूरी पहुंचे, दलाई लामा का जोरदार स्वागत किया गया। मैं उस समय 9 साल का बच्चा था और अब भी याद है कि दलाई लामा का स्वागत करने के लिए हाथ में तिरंगा लेकर सड़क पर खड़ा था। दलाई लामा कार में थे और लोगों का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। गोपाल के साथ उनकी मां भी थीं।‘ हैप्पी वैली में वर्तमान में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (एलबीएसएनएए) के पास बिड़ला हाउस में आध्यात्मिक नेता और उनके परिचारकों के लिए अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई थी।

    दलाई लामा की प्रधानमंत्री नेहरू से पहली मुलाकात भी 24 अप्रैल 1959 को मसूरी में ही हुई थी। अपनी आत्मकथा ‘फ्रीडम इन एक्साइल’ में दलाई लामा ने याद किया कि प्रधानमंत्री नेहरू के साथ उनकी मुलाकात 4 घंटे से अधिक समय तक चली थी। आध्यात्मिक धर्मगुरु ने मसूरी में पूरा एक साल बीताया। वह अप्रैल 1960 के अंतिम सप्ताह में यहां से धर्मशाला के लिए प्रस्थान कर गए जो उनका स्थायी निवास और निर्वासित तिब्बती सरकार का स्थान बन गया। अपनी आत्मकथा में दलाई लामा ने मसूरी में बिताए इस एक वर्ष को ‘एक हताश वर्ष’ के रूप में याद किया, क्योंकि इस दौरान तिब्बती लोगों के भविष्य को लेकर बहुत अनिश्चितता थी। हालांकि यह एक सघन गतिविधि का दौर भी था, क्योंकि आध्यात्मिक नेता ने विभिन्न लोगों के साथ कई बैठकें कीं और मसूरी में अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की, जिसमें दुनिया भर के पत्रकारों ने भाग लिया।

    भले ही दलाई लामा ने मसूरी को एक साल के प्रवास के बाद छोड़ दिया, लेकिन कई तिब्बती हैप्पी वैली में ही बस गए और यह क्षेत्र अब तिब्बती बस्ती आवास संस्थान और तिब्बतियों के लिए केंद्रीय विद्यालय जैसी संस्था्ओं से फल-फूल रहा है। मसूरी निवासी त्सेरिंग यूडन कहते हैं, ‘परमपावन दलाई लामा का मसूरी आना तिब्बती इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति उनके गहरे प्यार और समर्थन के लिए आभारी हैं।‘

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