• चीनी नेताओं को निर्भीक दृष्टि और तिब्बत मसले को हल करने का साहस दिखाना चाहिए

    लोदी ग्यालत्सेन ग्यारी साउथ चाइना मार्निग पोस्ट में प्रकाशित एक लेख में परमपावन दलाई के विशोष दूत कसुर लोदी ग्यालत्सेन ग्यारी ने उम्मीद जताई है कि मौजूदा चीनी नेतृत्व इस अवसर का फायदा उठाते हुए सामयिक तिब्बत के कठिन सचाई का सामना करने का साहस दिखाएगा और उसी तरह की निर्भीक दृष्टि का प्रदर्शन कर पाएगा जैसा कि देंग जियोंपिंग और हू याओबांग ने दिखाया था । लोदी ग्यारी ने लिखा है…. मैंने पिछले तीन दशक का ज्यादातर समय चीनी नेताओं से वार्ता में परमपावन दलाई लामा का प्रतिनिधित्व करने में बिताया है। मैं अपनी पूरी ताकत इस बात में लगाई है कि चीनी नेतृत्व तिब्बती जनता की आकांक्षा और परमपावन दलाई लामा के दृष्टिकोण को समझ सके ताकि शांति और मेलमिलाप का कोई मार्ग तलाशा जा सके। इन वर्षे में मैंने चीनी नेतृत्व के प्रकृति और ढांचे में भारी बदलाव देखा है – देंग जियोपिंग के निर्भीकता प्रदर्शान के युग से हू याओबांग जैसे राजनेता के व्यापक दृष्टिकोण तक , हल के दिनों मे संस्थागत दबावों और दृढता की कमी के युग तक। जब भी कोई स्वप्नद्रष्टा नेतृत्व आता है तो हम यह देख सकते है कि चीन ऐसे कदम उठाने में सक्षम होता है जिससे देश के एकता और अखंडता की रक्षा होती है, सभी नागरिकों के हितों को बढावा मिलता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की सकारात्मक छवि बनती है । तिब्बत मसले पर चीनी नेतृत्व का जिस तरह का रवैया रहा है उसका असर चीन में सदभावपूर्ण समाज बनाने और विशव मंच पर उसकी छवि पर पड रहा है। अपने काम के एक हिस्से के तहत ही मैं यह समझने का प्रयास करता रहा हुं कि आखिर चीनी नेतृत्व के मौजूदा रवैए के पीछे क्या कारण हो सकता है। मुझे लगा कि इसके पीछे तीन तरह की सोच हो सकती है। पहली सोच यह हो सकती है कि चीन आगे बढ रहै है और उसकी इस नई पहचान में समाहित होने के लिए सभी जातीय समूहों को अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं में परिवर्तन लाना चाहिए । ऐसा लगता है कि चीन में इस दृष्टिकोण को मानने वाले तिब्बती लोगों की अलग पहचान का सम्मान नहीं करना चाहते औऱ उसे दबाना चाहते है। बीजिंग को यह गलतफहमी हो गई है कि तिब्बत में उसने जो कृत्रिम स्थिरता ला रखी है वह इस बात का संकेत है कि तिब्बतियों में उसकी नीति को लेकर मौन रुप से कडवाहट औऱ निराक्षा बढने का संकेत है। दमनकारी दशाओं में इस तरह का माहौल और बढता है। साफ कहा जाए तो यह ऐसी चुप्पी है जिसमें भविष्य में हिंसा और अस्थिरता के बीज देखे जा सकते है। दूसरे तरह की सोच यह है कि यदि चीन सरकार तिब्बती क्षेत्रों की आर्थिक दशा सुधारने में सफल होती है, तिब्बती लोगों की चिंताओं का समाधान होता है तो समूचा मसला अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन यह भी तिब्बती समस्या को हल करने का काफी संकुचित रवैया है। तिब्बती लोगों का आर्थिक रुप से हाशिए पर जाना एक ऐसी सचाई है जिसका चीनी नेतृत्व को समाधान करना है, आधिकारिक आंकडों से साफ है कि तिब्बती लोग आर्थिक विकास के पैमाने के बिल्कुल निचले पैमाने पर है। हालांकि , जैसा कि तिब्बत मसले के चीनी विद्धान और विशोषज्ञ यह जानते है कि तिब्बती लोग अपने विशिष्ट संस्कृति के प्रति भारी सम्मान रखते है, जिसने नए चीन के विकास में भारी योगदान दिया है। तिब्बती लोगों को इस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को फलने – फूलने तथा इसको और समृद्ध बनाने का पर्याप्त मौका देना चाहिए । यह केवल आर्थिक विकास से नही हो सकता , हालांकि यदि अच्छी मंशा से किया जाए तो कुछ जरुर हो सकता है। उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का प्रदर्शन किए बिना यदि कोई आर्थिक एकीकरण प्रयास किया गया तो वह तिब्बती लोगों मे और असंतोष को ही बढावा देगा। समूचे तिब्बती क्षेत्रों में साल 2008 से ही जिस तरह प्रदर्शन हुए उससे चीनी अधिकारियों को यह साफ संदेश समाझ जाना चाहिए था। तीसरी सोच यह है कि चीन को मौजूदा दलाई लामा के निधन का इंतजार करना चाहिए क्योंकि इसके बाद तिब्बत मसला अपने आप खत्म हो जाएगा। यह सोच इस धारणा पर आधारित है कि एक नेतृत्वविहीन और भ्रांतिपूर्ण आंदोलन टुकडों में बंट जाएगा और अंतत वह अप्रासंगिक हो जाएगा । कई वजहों से यह सोच काफी गलत है और यह चीन के अपने भविष्य के लिए ठीक नहीं है। जो लोग इस तरह की सोच रखते है वे यह नही समझते कि आज किसी आंदोलन के टुकडों में बंटे होने का मतलब उसका अप्रासंगिक हो जाना नही होता है। बल्कि इसका मतलब अकल्पनीय क्रांतिकारिता और बहुत ज्यादा जोखिम होता है। धुंधला होने की जगह तिब्बती राजनीतिक आंदोलन मौजूदा 14 वें दलाई लामा के नए रहने पर अपने को नए सिरे से तलाश करेगा और ऐसा आंदोलन बनेगा जो जटिल और अप्रबंधनीय नहीं रहेगा। यह देखकर काफी तकलीफ होती है कि चीन के नेता शुरुआती दिनों के साहसी सुधार प्रक्रिया से अब कितने दूर हो गए है। अस्सी के दशक के शुरुआती सालों में मैं जिन नेताओं को जानता था उनका उन कठिन बदलावों के प्रति दृढ विशवास था जिसकी माओ के बाद वाले चीन को जरुरत थी। हू याओबांग जैसे नेता यह समझते थे कि चीन के भविष्य की महानता असल स्थिरता के लिए जरुरी जमीनी काम शुरु करने के लिए उसके नेताओं के जिम्मेदारी स्वीकार करने का साहस रखते थे, इसलिए वह तिब्बती लोगों को दिल जीत सके थे। मुझे उम्मीद है कि आज के चीन के नेता अवसर का फायदा उठाएंगे और सामयिक तिब्बती के कठिन सचाई का सामना करने का साहस दिखाएंगे , जैसे साहसी दृष्टि देंग और हू द्वारा दिखाई गई थी। जहां तक हमारी बात है, अपने तरफ से हमने औपचारिक रुप से तिब्बती लोगों के लिए वास्तविक स्वायत्तता के लिए दिए उस ज्ञापन में परमपावन के ऱुख को साफ कर दिया है जो नवंबर , 2008 में आठवें दौर की वार्ता में पेश किया गया था । इस साल जनवरी में पेश किए गए ज्ञापन और संबंधित नोट के द्वारा हमने यह साफ और निशिचत शर्ता में कहा है कि हम चीन जनवादी गणराज्य , उसके संविधान और कानून के ढांचे के तहत केवल वास्तविक स्वायत्तता चाहते है। हमने यह बात पूरी तरह साफ कर दी है कि हम चीन जनवादी गणराज्य के प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता, केंद्र सरकार की सत्ता का सम्मान करेंगे और क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्वायत्तता की व्यवस्था का पालन करेंगे। लेकिन चीन की केंद्र सरकार को भी हमारे विशिष्ट और अलग पहचान को बनाए रखने के लिए तिब्बती जनता के वैधानिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि यह हमारी प्रमुख चिंता है। चीनी नेताओं को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और तिब्बत मसले का वास्तविक हल निकालने के लिए गंभीर प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। मौजूदा समय में जो विशिष्ट अवसर मिलता दिख रहा है उसकी वजह से इस जिम्मेदारी की तात्कालिकता और सुस्पष्ट हो गई है। इसके पहले दलाई लामा जैसा कोई तिब्बती नेता नहीं था जो तिब्बती एंव चीनी जनता के लिए स्वप्नदर्शी बदलाव लाने हेतु मजबूती से और लगातार ऐसे चुनौतीपूर्ण रास्ता पर चलन जारी रखे। चीन जनवादी गणराज्य अपने को एक बहुजातीय राज्य बताता है जिसमें सभी राष्ट्रीयता के लोग बराबर की ताकत और अधिकर रखते है। उसका दावा है कि यह ऐसा देश नहीं है जहां बहुसंख्यक बराबर की ताकत और जोखिमपूर्ण रास्त पर चलन जारी रखे। चीन जनवादी गणराज्य अपने को एक बहुजातीय राज्य बताता है जिसमें सभी राष्ट्रीयता के लोग बराबर की ताकत और अधिकर रखते है। उसका दावा है कि यह ऐसा देश नहीं है जहां बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों पर राजनीतिक प्रभुत्व रखते हो । चीनी नेताओं को एक ऐतिहासिक विकुल्प चुनना होगा क्या वे चीन को ऐसे शांतिपूर्ण भविष्य की ओर से जाएंगे जिसमें तिब्बती लोगों को अंतत एक आधुनिक चीनी राज्य के भीतर एक टिकाउ घर मिल सके ? या वे दूसरे तरह का भविष्य देखना चाहेंगे क्योंकि अलगाववाद के बीज दिख चुके है जिसमें अलग तरह के भविष्य के लिए नकारात्मक परिणाम हासिल होंगे ? मैं जानता हूं कि परमपावन दलाई लामा ने इतिहास का सही पक्ष चुना है । मैं केवल इस बात की उम्मीद कर सकता हूं कि चीनी नेता भी इसके लिए तैयार दिखें । ( लोदी ग्यारी परमपावन दलाई लामा के विशोष दूत और चीनी नेतृत्व के साथ वार्ता करने वाले दल के मुखिया है)

    Categories: मुख्य समाचार, समाचार, स्थायी स्तम्भ

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *